जयपुरः चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है. इस साल इस बार चैत्र नवरात्रि 19 मार्च 2026 से प्रारंभ हो रहे हैं, जिसका समापन 27 मार्च होगा. पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि चैत्र नवरात्रि प्रतिपदा तिथि से ही नया हिंदू वर्ष प्रारंभ हो जाता है. चैत्र नवरात्रि में अबकी बार पूरे नौ दिनों की नवरात्रि होगी. हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4:52 मिनट पर होगा. इसलिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च को घटस्थापना के साथ होगी. उदया तिथि के अनुसार इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होगी और इसका समापन 27 मार्च को होगा. इस बार माता रानी पालकी में सवार होकर आ रही हैं. यह संकेत देता है कि इस बार उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा. इसका असर संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा. मान्यताओं के अनुसार, माता रानी का पालकी पर आने अर्थ ये है कि देश-दुनिया महामारी और बीमारी की चपेट में आ सकती है. वहीं, इसे व्यापार, अर्थव्यवस्था और राजनीति के लिए भी शुभ नहीं माना गया है.
ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हर बार नवरात्र में देवी अलग-अलग वाहन पर आती हैं, और उस वाहन के हिसाब से अगले छह महीने की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है. इस बार मां दुर्गा पालकी पर सवार होकर आएंगी. देवी भागवत में पालकी में माता के आगमन का फल "ढोलायां मरणं धुवम्" बताया गया है जो जन हानि रक्तपात होना बताता है. अर्थात पालकी (डोली) पर माता का आगमन शुभता का संकेत नहीं है. माता का डोली पर आगमन सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल व महामारी का परिचायक माना गया है. पूरे साल चार नवरात्रि आती है जिनमें आश्विन और चैत्र मास की नवरात्रि सबसे ज्यादा समाज में प्रचलित है. कहा जाता है कि सतयुग में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और प्रचलित चैत्र नवरात्रि थी, इसी दिन से युग का आरंभ भी माना जाता है. इसलिए संवत का आरंभ में चैत्र नवरात्रि से ही होता है.
देवी मां दुर्गा के वाहन का प्रभाव
ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि यूं तो मां दुर्गा का वाहन सिंह को माना जाता है. लेकिन हर साल नवरात्रि के समय तिथि के अनुसार माता अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर धरती पर आती हैं. यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं. माता दुर्गा आती भी वाहन से हैं और जाती भी वाहन से हैं. देवीभाग्वत पुराण में जिक्र किया गया है कि शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे. गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥ इस श्लोक में सप्ताह के सातों दिनों के अनुसार देवी के आगमन का अलग-अलग वाहन बताया गया है. अगर नवरात्र का आरंभ सोमवार या रविवार को हो तो इसका मतलब है कि माता हाथी पर आएंगी. शनिवार और मंगलवार को माता अश्व यानी घोड़े पर सवार होकर आती हैं. गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्र का आरंभ हो रहा हो तब माता डोली पर आती हैं. बुधवार के दिन नवरात्र पूजा आरंभ होने पर माता नाव पर आरुढ़ होकर आती हैं. नवरात्रि का विशेष नक्षत्रों और योगों के साथ आना मनुष्य जीवन पर खास प्रभाव डालता है. ठीक इसी प्रकार कलश स्थापन के दिन देवी किस वाहन पर विराजित होकर पृथ्वी लोक की तरफ आ रही हैं इसका भी मानव जीवन पर विशेष असर होता है.
पालकी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा
कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हर बार नवरात्र में देवी अलग-अलग वाहन पर आती हैं, और उस वाहन के हिसाब से अगले छह महीने की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है. इस बार मां दुर्गा पालकी पर सवार होकर आएंगी. देवी भागवत में पालकी में माता के आगमन का फल "ढोलायां मरणं धुवम्" बताया गया है जो जन हानि रक्तपात होना बताता है. अर्थात पालकी (डोली) पर माता का आगमन शुभता का संकेत नहीं है. माता का डोली पर आगमन सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल व महामारी का परिचायक माना गया है. पालकी (डोली) पर माता का आगमन आर्थिक तंगी, मानसिक अशांति, प्राकृतिक विपदा या महामारी के बढ़ने का संकेत देता है.
तिथि
भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4:52 मिनट पर होगा. इसलिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च को घटस्थापना के साथ होगी. उदया तिथि के अनुसार इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होगी और इसका समापन 27 मार्च को होगा. चैत्र नवरात्रि प्रतिपदा तिथि से ही नया हिंदू वर्ष प्रारंभ हो जाता है.
नक्षत्र एवं शुभ योग
भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि नवरात्रि के पहले दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, शुक्ल योग का संयोग भी रहेगा. नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना और घटस्थापना की जाती है.
घट् स्थापना का मुहूर्त
द्विस्वभाव मीनलग्न प्रातः 06:54 से प्रातः 07:50 तक
मिथुनलग्न प्रातः 11:24 से दोपहर 01:38 तक
शुभ चौघड़िया प्रातः 06:54 से प्रातः 08:05,
चर-लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः वकः 84 से दोपहर 03:32 तक
अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:11 से 12:59 तक रहेगा.