KeyNote by Pawan Arora: प्रेमानंद महाराज, हिन्दू-मुस्लिम, PM मोदी..! जानिए जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW में क्या कहा?

जयपुरः फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के CEO और मैनेजिंग एडिटर पवन अरोड़ा ने पद्म विभूषण जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य तुलसी पीठाधीश्वर का KeyNote by Pawan Arora कार्यक्रम में SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW लिया. जिसमें सटीक सवालों का जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने जवाब दिया. 

मैं जगद्गुरु बना नहीं, मेरी सरस्वती ने मुझे जगद्गुरु बनाया:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैं जगद्गुरु बना नहीं, मेरी सरस्वती ने मुझे जगद्गुरू बनाया है. मैं ये कहने में गौरव महसूस करुंगा कि जगद्गुरु की हमारी एक परंपरा थी, एक परिभाषा थी. जगद्गुरु वो होता था जो तीन संस्कृत में भाष्य लिखता था. ये तीन ग्रंथ रहे हैं, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता और दस उपनिषद. सौभाग्य से मैंने 12 उपनिषद पर भाष्य लिखा, दो और बढ़ाया श्वेताश्वतर और रामतपनीय उपनिषद. गीता पर भाष्य लिखा, ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा और नारद भक्तसूत्र पर भाष्य लिखा. मैं बहुत प्रसन्नता अनुभव कर रहा हूं कि जगद्गुरु की सभी शास्त्रीय पात्रता मैंने धारण की. यद्पि शंकराचार्य से लेकर वल्लभाचार्य तक ये परंपरा चली थी. 600 वर्ष तक ये परंपरा लुप्त थी, उसको  मैंने फिर प्रारंभ किया. परिवार तो मेरा साधारण नहीं था, पहले का पांच गांवों का जमींदार परिवार था. बड़ा परिवार, धार्मिक परिवार और ब्राह्मण परिवार वो भी वशिष्ठ गोत्रीय परिवार. जन्म के दो माह के पश्चात ही मेरे नेत्रों ने मुझे छोड़ा. 1950 की 14 जनवरी को मेरा जन्म हुआ, ठीक 14 मार्च को मेरे नेत्र बंद हो गए. परंतु मैंने अपना अध्यवसाय नहीं छोड़ा. मैं ये कहूं तो आपको बहुत अच्छा लगेगा कि कंटक बृंद के बीच खिले पशुओं के लिए प्रतिकूल बने हम. आतप सितव वयारी सहे अलीगुंजन के अनुकूल बने हम. मालिक माला की शोभा बढ़ाकर, भामिनी के सदुकूल बने हम. जीवन की बगिया में अहो, सतशूल सहे फिर फूल बने हम. शिक्षण जगत में भी मैंने प्रवेश किया. उसके पहले 5 वर्ष की उम्र में संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता को मैंने कंठस्थ कर ली थी. 7 वर्ष की अवस्था में रामचरितमानस. ब्रेल लिपि का सहारा लिए बिना मैं स्नातक में भी पढ़ा और परा स्नातक में भी. मैं तथाकथित बाबा नहीं हूं, पढ़ता-लिखता हूं. P.hd, D.Litt, JRF और उपाधियां तो बहुत सी मुझे मिलीं. ये तो प्रभु राघव भगवान राम के प्रेम ने मुझे बाबा बना दिया. अन्यथा मुझे तो HOD बनाकर UGC ने भेज दिया था. 

मैंने जीवन में कभी ब्लाइंड कन्सेशन नहीं लिया: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैंने जीवन में कभी ब्लाइंड कन्सेशन नहीं लिया. 

रामभद्राचार्य ने इंदिरा गांधी के लिए कही ये बड़ी बात:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि जो आवश्यक हो वो मैं देखता हूं और जो अनावश्यक है वो नहीं देखता. मुझे स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी ने भी कहा कि आपकी दृष्टि की व्यवस्था करा दी जाए, तो मैंने मना कर दिया.

श्रुति–स्मृति के बल पर 375 पुस्तकें लिखीं: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में रहकर मैंने अब तक 375 पुस्तकें लिखीं.

श्रीराम सभी नायकों में सर्वोच्च क्यों हैं?: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि आज तक जितने नायक हुए जो हैं और जो होंगे, श्रीराम सभी में हैं. 'राम' का अर्थ है रा यानि 'राष्ट्र' और म का अर्थ है 'मंगल'. जिनसे राष्ट्र का मंगल होता है वही हैं 'राम', भगवान कृष्ण भी मेरे आराध्य हैं, सभी आराध्य हैं'. 'मैं किसी का विरोध नहीं करता, वाल्मीकि रामायण की बंग प्रति में हमने देखा है. रावण के वध के पश्चात लक्ष्मण जी ने कहा कि भैया थोड़ी देर लंका में विश्राम कर लिया जाए. तो रामजी ने कहा नहीं, "अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते", जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" मैं चुनौती से कहता हूं कि विश्व के किसी नायक ने अपनी जन्मभूमि के प्रति इतना ममत्व दिखाया हो तो आप हमें बताएं.' 

रामजन्मभूमि के लिए जेल, लाठी और गवाही:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि ये तो निश्चित है कि सत्य को अपलपति नहीं किया जा सकता. मोदी जी मेरे मित्र हैं और 1988 से मित्र हैं, हम दोनों की कोई स्वार्थ की संगति नहीं है. हम दोनों जब मिलते हैं तो ना मोदी प्रधानमंत्री और ना मैं जगद्गुरु, दोनों मित्र होते हैं. अटलजी से भी मेरी बहुत अच्छी मित्रता थी, ये उपलब्धियां तो स्वयं पुरस्कार दिलवा देती हैं. हां इतना है कि कांग्रेस ने मुझे उतना समझा नहीं और वो समझ भी नहीं सकते. राजीव गांधी कुछ समझते थे, पर वो नहीं रहे. इस पर और कुछ अभी नहीं कह रहा हूं पर ये लोग तो कुछ समझते नहीं हैं. मोदी जी समझते हैं, सरकार समझती है और मैं भी. रामजन्म भूमि के लिए मेरा बलिदान, 1984 से मैं जुड़ा रहा. जेल गया, पुलिस के डंडे खाए, डंडे से मेरी कलाई टूट गई. तो सब कुछ हुआ और रामजन्म भूमि की गवाही देने का प्रश्न आया. सभी शंकराचार्य मुकर गए कि हम नहीं जाएंगे गवाही देने. किसी ने कहा कि हमारे ठाकुर मना कर रहे हैं. जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैंने कहा सुनो, मैं वशिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण हूं और वर्तमान में पूर्ण रूप से मैं ही जगद्गुरु हूं. मैं जगद्गुरु रामानन्दाचार्य हूं, इस मुकदमे में रामलला जी नाबालिग हैं. जब वादी नाबालिग होता है तो माता-पिता और गुरु उसका पक्ष लेते हैं. मैं गुरु उनकी गोत्र का हूं, मैं पक्ष लूंगा उनका और पक्ष लिया. जो विपक्षी वकील अन्य गवाहों को 9-9 महीने रुलाते थे, 12-12 महीने. उनको मैंने 7 दिन में उसी प्रकार निचोड़कर रखा जैसे कोई नींबू निचोड़ देता है.

मोदी से मित्रता, सत्ता से नहीं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि बहुत अच्छा, आप देखिए अब चूंकि मैं पद्म विभूषण भी हूं पर टीवी से नहीं आकाशवाणी से. अब हम चौथी अर्थव्यवस्था बन गए हैं पहले कितने पीछे थे आप जानते हैं. अब तीसरी अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं बहुत जल्द ही और उत्पादन में तो हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया. अभी हाल ही में कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह का बयान था कि हम अच्छा कर रहे हैं, अच्छा करते रहेंगे और 2047 तक विकसित भारत बनाकर रहेंगे. बहुत अच्छा विजन दिया है 'विकसित भारत-2047' का. जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैंने एक पुस्तक लिखी जो आज के जगत में सबसे बड़ी पुस्तक है. पाणिनि अष्टाध्यायी पर तीन प्रतियां' ये दो संस्कृत में और एक हिंदी में है. ये पुस्तक 10 हजार पृष्ठों की है, आज उसका मूल्य भी 10 हजार रुपए है. इसको राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान ने छापा, इसका लोकार्पण करने के लिए स्वयं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी 27 अक्टूबर 2023 को चित्रकूट आए और इसका लोकार्पण किया. हम ये मानते हैं कि सभी सब कुछ नहीं हो सकते. प्रत्येक व्यक्ति सब कुछ तो नहीं हो सकता पर जो जहां है. वहां इतना अच्छा करे कि फिर उसकी प्रतिस्पर्धा में कोई आ न सकें. मैं जहां हूं वहां इतना अच्छा करूंगा कि लाखों आंख वाले मिलकर नहीं कर पाएंगे. 

चारों आश्रमों की आत्मा है भक्ति:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 'ब्रह्मचर्य है, गार्हस्थ्य है, गृहस्थ नहीं बोलना चाहिए, वानप्रस्थ और संन्यास है. चारों आश्रमों में भक्ति है, ब्रह्मचर्य में भी भक्ति है, गार्हस्थ्य में भी भक्ति है. वानप्रस्थ में भी भक्ति हैं और संन्यास में भी है. बिना भक्ति के ये चारों रह नहीं सकते हैं, इन चारों का भक्ति आधार है.

भक्ति का गरीबी-अमीरी से कोई संबंध नहीं: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि पहले मैं भक्ति का आपको अर्थ समझा दूं. भक्ति का मतलब होता है प्रभु और भारत माता पर प्रेम, तो उसका संपत्ति और विपत्ति से कोई लेना देना नहीं है. ये तो स्वाभाविक है और चारों आश्रमों और चारों वर्णों में भी है. भक्ति सबका आधार है, पाणिनी सूत्र लिखते हैं. भारतीय की व्याख्या कि "भारतम् भक्ति यस्य सह भारत अहं. भारत जिसके भजन का आश्रय है वह भारतीय है. 

गृहस्थ जीवन में भी पूर्ण समर्पण संभव है:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैंने आपको भक्ति की व्याख्या बताई. प्रेम...समर्पण को शरणागति का प्रश्न आ गया, हमें भगवान से प्रेम करना चाहिए. जैसे पुत्र से प्रेम करते हैं, मित्र पर विश्वास करते हैं, स्वामी से डरते हैं. इन्हीं तीनों को मिलाकर भक्ति कहते हैं. 

भक्ति तीन भावों का संगम: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 'शिकंजी पिए हैं ना, शिकंजी में तीन वस्तुएं होती हैं. जल होता है, जल के साथ नींबू होता है और नमक होता है या मीठा होता है. इन तीनों को मिलकर शिकंजी बनती है. उसी प्रकार भक्तिरस भी इन तीनों को मिलकर बनता है. मित्र का विश्वास, पुत्र का प्रेम और स्वामी का आदर.

आज के समय में रामराज्य अभी दूर: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 'अभी नहीं कह सकते, राम जी की भक्ति  धीरे-धीरे आ रही है. भगवान करे आ जाए, क्यों कि कदाचार, भ्रष्टाचार हमारी जड़ तक पहुंच गया है. जहां देखो वहां भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है, समय लगेगा भगवान करे ऐसा हो जाए तो बहुत अच्छा है.

भ्रष्टाचार खत्म करना समाज का काम:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 'इसमें शासन कुछ नहीं कर सकता, ये तो जनता का विषय है, धर्माचार्यों का विषय है. आपने देखा होगा कि एक वक्तव्य में मैंने कहा कि सबको संस्कृत पढ़ना चाहिए तो बड़ा बवाल हुआ था. तो मैं डरता नहीं हूं, प्रत्येक धर्माचार्य को संस्कृत का ज्ञान अवश्य होना चाहिए. भारत की दो प्रतिष्ठाएं हैं संस्कृति और संस्कृत. तो यदि हम संस्कृति और संस्कृत के साथ अपनी चर्चा करेंगे. तो निश्चित रूप से समाज में बदलाव आएगा. आप भी देख रहे होंगे कि बहुत बदलाव आया है, बहुत परिवर्तन हुआ है. हमारे बचपन में जल्द कोई नाम लेने से डरता था, एकांत में लोग रामायण पढ़ लेते थे. लेकिन समूह में नहीं होता था, अब धीरे-धीरे बहुत परिवर्तन आया है और मुझे लगता है कि 21वीं सदी हमारी रहेगी. रामलला हमारे आ गए और कृष्ण जन्मभूमि के लिए भी हम संघर्ष कर रहे हैं. काशी विश्वनाथ के लिए भी कर रहे हैं, हिंदुत्व बुलंदी पर होगा. विदेशों में हिंदुओं पर अत्याचार बहुत हो रहा है, हमने बांग्लादेश से ऐसी अपेक्षा नहीं की थी. जिस समय बांग्लादेश घोषित किया गया उस समय मैं विद्यार्थी था मैं वो दृष्य जानता हूं. हमारे सहयोग से बांग्लादेश बना और वहां हिंदुओं पर अत्याचार हो ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. 

हिंदुत्व संप्रदाय नहीं, विचारधारा:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि नहीं, नहीं लोग हिंदू शब्द का अर्थ ही नहीं समझते. हिंदू शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'ही' और 'इंदु'. जो हिमालय के समान स्थिर हो और इंदु माने चंद्रमा के समान शीतल हो, वही तो हिन्दू है. हिन्दू ये संप्रदाय नहीं है, ये विचारधारा है. आज की इस वैश्विक जटिल परिस्थिति में हिन्दू विचारधारा ही विश्व को शांति दे सकती है. ऐसा मेरा मानना नहीं, मेरा अनुभव है. जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि This is not my thinking. This is my realization. 

धर्म और राजनीति पति–पत्नी जैसे:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि धर्म पति है और राजनीति पत्नी है. पति के बिना पत्नी विधवा रहती है और पत्नी के बिना पति विधुर रहता है. इसी प्रकार धर्म के बिना राजनीति विधवा होगी और राजनीति के बिना धर्म विधुर रहेगा. दोनों का समन्वय होना चाहिए, धर्म का अर्थ घंटी बजाना नहीं है. मंदिर जाना नहीं है, धर्म का अर्थ है निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना.
 
धर्म एक है, पंथ अनेक:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि धर्म एक ही है, धर्म सब नहीं हो सकते और तो पंथ हैं, सनातन धर्म है और मैं फिर कह रहा हूं, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना ही धर्म है. वो चाहे हिन्दू वर्ग का हो, चाहे मुस्लिम वर्ग का हो, कहीं भी हो. धर्म ने किसी को मारने की बात नहीं कही, किसी को सताने की बात नहीं कही. स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (गीता अध्याय -18 श्लोक -46). अपने कर्म से ही भगवान की पूजा करनी चाहिए, ये अवधारणा केवल भारत में है अन्यथा नहीं है.

हिन्दुत्व ही सनातन धर्म: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि नहीं, हिन्दुत्व हिंदू धर्म है और बाकी पंथ हैं. पंथ वो होता है जो बाद में चलाया जाए और हिन्दू धर्म तो जब से सृष्टि है तब से स्वयं चल रहा है, इसे किसी ने नहीं चलाया.

सेक्युलरिज्म का अर्थ धर्मनिरपेक्ष नहीं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मुझे एक बात फिर कहनी है कि सेक्युलरिज्म का अर्थ धर्मनिरपेक्ष होता ही नहीं है. हमने तो ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी भी पढ़ी है, सेक्युलरिज्म का अर्थ है पंथ निरपेक्ष- धर्म नहीं. ये भी पहले हमारे भारतीय संविधान में नहीं था. ये आपातकाल जब लगाया इंदिरा जी ने, तो 26 दिसंबर 1975 को जब कोई नहीं था. तो रात में ठूंस दिया, इस सेक्युलरिज्म को. देखिए आप जब संसद में देखेंगे तो अध्यक्ष की सीट के ऊपर लिखा है "धर्मचक्र प्रवर्तनाय" और सुप्रीम कोर्ट का नारा है उद्घोष है "यतो धर्मस्ततो जयः" तो लोग धर्म का अर्थ गलत समझते हैं.

गीता में धर्म और नैतिकता एक हैं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 'गीता जी के प्रथम श्लोक में "धर्मक्षेत्रे'' कहा गया और अंतिम श्लोक में 'ध्रवानीति' कहा गया.

“धर्म का पतन नहीं, जागरण हो रहा है:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि नहीं, ऐसा नहीं है, बहुत कुछ सुधर गया है. कहना नहीं चाहिए, लेकिन हिंदू विश्वासघात कभी नहीं करता. अभी लाल किले के पास जो हमला हुआ, उसमें मुस्लिम वर्ग ने विश्वासघात किया. वो भी डॉक्टर्स थे सोचो आप, कितनी लज्जा की बात है. तुम एक यूनिवर्सिटी में डॉक्टर हो, चिकित्सक हो और आज तुम ही मानवता का खून पीने के लिए भूखे हो गए हो.

आतंकवाद को जड़ से समाप्त करेंगे:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने जम्मू कश्मीर के पहलगाम आतंकवादी हमले के सवाल पर कहा कि उसका हमने दंड दे दिया अभी और दंड देंगे. ऑपरेशन सिंदूर केवल स्थगित हुआ है समाप्त नहीं हुआ. आतंकवाद को जड़ से समाप्त करेंगे.

PoK मिलेगा, केवल समय लगेगा:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मेरी यही मान्यता है, इसलिए हम महायज्ञ भी कर रहे हैं. ये यज्ञ इसलिए हो रहा है कि PoK हमें मिल जाए, मिल जाएगा, थोड़े दिन लगेंगे. आतंकवाद को हम नहीं रहने देंगे, जड़ से समाप्त करेंगे, नक्सलवाद को भी हम नहीं रहने देंगे. 
 
गौवध निषेध कानून क्यों अटका?: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने गौवध निषेध कानून के सवाल पर कहा कि गौवध निषेध कानून बन सकता है, इस बार भी हम बना रहे थे पर जनता ने ही विश्वासघात कर दिया. थोड़ी सी भाजपा को सीट कम आईं, यदि हम 300 से ऊपर चले गए होते केवल भाजपा में. मोदी जी और हम लोगों का मन था कि हम गौवध निषेध कानून ला ही देंगे. तो अभी ये बात आपने कही ये आध्यात्मिक गुरु के बजाय राजनैतिक गुरु के रूप में कही. आध्यात्म, राजनीतिक की कोई बात नहीं है, मैं हूं ही इसी प्रकार और संत तो पढ़ते-लिखते नहीं हैं, उनको पुजवाने से ही समय नहीं मिलता. मैं प्रतिदिन दो लाख राम नाम का जप करता हूं, फिर जल पीता हूं और पढ़ता बहुत हूं अभी भी, तो मुझे समझ में नहीं आता कि आध्यात्मिक और राजनैतिक गुरु में क्या अंतर होता है ? दोनों एक ही तो हैं. 

धर्म के विरुद्ध बोलने पर रोष स्वाभावि:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि जब भी धर्म के विरुद्ध कोई कहेगा तो मुझे रोष आएगा. रोष उसी को आता है जो व्यक्ति अपनी दिनचर्या शास्त्रीय पद्धति से चलाता है.मुझे किसी पर क्रोध नहीं आता ये तो भाषा है. मेरा तात्पर्य ये है कि भारत में रहते हो तो भारतीयता की बात करो. रह रहे हो भारत में और बात करोगे पाकिस्तान की और इंग्लैंड की तो जाओ वहीं मरो.  

आपने प्रेमानंद जी पर भी टिप्पणी कर दी थी ?:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि अभी भी कह रहा हूं कि संस्कृत जानना चाहिए. वो तो मेरे बालक हैं मेरा कोई विद्वेष नहीं है.  

संस्कृत के बिना संस्कृति नहीं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि संस्कृत में ही तो भारतीय संस्कृति है. संस्कृत छोड़ोगे तो भारतीय संस्कृति कहां जाएगी बताइए. शुक्ल यजुर्वेद के 7वें अध्याय के 14वें मंत्र में स्पष्ट है. सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा कि भारतीय संस्कृति प्रथम संस्कृति है.   

मेरी सर्जरी में हनुमान जी साथ थे:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि ये सही था, अब तो डॉक्टर मान रहा है. आम संसार वाले जानते नहीं, वो डर रहे थे. मैंने कहा तुम करो कुछ नहीं होगा, हम हनुमान जी के साथ खेलते रहेंगे तुम करते रहना. उन्होंने कहा गुरुजी मुझे डर लग रहा है आप पद्म विभूषण भी हैं. कुछ हो जाएगा तो मेरी तो नौकरी चली जाएगी, मुझे दंड भी मिलेगा. मैंने कहा नहीं, तुम मुस्कुरा कर करो और वही हुआ.

बाल रूप में श्रीराम के दर्शन होते हैं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैं बिल्कुल इनकार नहीं कर रहा हूं. मैं उनके गुरु गोत्र का हूं, मुझे तो बहुत आनंद आता है उनसे. बाल रूप में मुझे रामजी के अधिक दर्शन होते हैं. ऐसी घटनाएं मेरे जीवन में आती हैं, मैं झूठ नहीं बोलता. मान लो कभी मैं रास्ता भटक जाऊं तो मुझे लगता है कि एक बालक आकर मेरा हाथ पकड़कर मुझे रास्ता बता रहा है. भगवान राम से आनंद आता है पर वो चमत्कार के लिए नहीं. मैं चमत्कार पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता. 

1412वीं रामकथा, एक भी पैसा अपने लिए नहीं लिया:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 1158 भागवत मैंने की हैं और 1412 वीं श्रीराम कथा मैं कर रहा हूं. इसका एक भी पैसा मैंने अपने लिए नहीं लिया, सब समाज को दे डाला. 1500 करोड़ में मैंने दिव्यांग विश्वविद्यालय बनाकर प्रभार सरकार को दे दिया. तुलसी पीठ बनाया और प्रज्ञा चक्षु विद्यालय बनाया और मेरा एक नियम है कि मैं प्रतिवर्ष 50 लाख से कम का दान नहीं करता. उनको जो अभावग्रस्त होते हैं और किसी को बताता भी नहीं.

धर्म में भी पढ़ा-लिखा होना जरूरी: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि सर्वत्र, जहां मैं रहता हूं प्रेम करते हैं लोग. समस्या ये है कि चाहे राजनेता हो या कोई और उसको पढ़ा लिखा होना चाहिए. बाबा वाक्यं प्रमाणम' से ही काम नहीं चलेगा.  

विश्व शांति हिंदुत्व के बिना संभव नहीं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि 'हिंदुत्व की भावना जब तक पूरे विश्व में नहीं आ जाएगी. जब तक प्रत्येक व्यक्ति के मन में नहीं आ जाएगा तब तक नहीं होगा. आप ट्रंप की दादागिरी देखो ना, पर क्या इस दादागिरी से भारत झुकेगा? अभी देखो वेनेजुएला के राष्ट्रपति को किडनैप कर लिया उसने ये कोई बात हुई. ऐसा नहीं होना चाहिए, स्वयं जिओ और दूसरे को भी जीने दो.

मेरी अंतिम इच्छा: चिकित्सा विश्वविद्यालय:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि पहली बात, सबकुछ तो हो गया पर अभी एक मेरी इच्छा है कि मैं चित्रकूट, उत्तरप्रदेश में चिकित्सा विश्वविद्यालय बनाऊं मेडिकल कॉलेज नहीं, मेडिकल यूनिवर्सिटी. जिसमें चारों प्रकार की चिकित्सा शिक्षा वहां पढ़ाई जाएंगी. एलोपैथ, होम्योपैथ, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा का समग्र सिद्धांत वहां हो ये मेरी इच्छा है. अब देखिए मेरे पास इतने पैसा भी नहीं, भगवान कैसे करेंगे, वो करेंगे. आगे जो भी इच्छा होगी समाज के लिए होगी, मेरे अपने लिए नहीं. आपको सुनकर अच्छा लगेगा कि आज की तारीख में मेरा बैंक में कोई अकाउंट नहीं है. सभी बाबाओं का होता है मेरा कुछ भी नहीं है और आप देखिए मेरा भेष भी बहुत साधारण है. विद्या ही मेरा आभूषण है मैकअप मैं कभी करता नहीं और चेहरा किसी से कम सुंदर नहीं है.

रामायण से जीवन का सबसे बड़ा संदेश:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि इसमें तीन बाते हैं और श्रीराम कथा कहती है कि बचपन को प्रबुद्ध करो, यौवन को शुद्ध करो और वृद्धावस्था को सिद्ध करो.

14 जनवरी को मेरा 77वां जन्मदिवस: 
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि '1950 को 14 जनवरी को ही मेरा जन्म हुआ था, 76 वर्ष हो गए और जन्मदिन 77वां है.

जन्मदिन पर मैं प्रभु की कृपा को प्रणाम करता हूं:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि मैं इसी बहाने प्रभु की कृपा को प्रणाम करता हूं.जन्मदिन के बहाने कि प्रभु जैसी परिस्थिति मेरी थी आपने इतना किया. इतनी बड़ी कृपा की, जिसकी मेरी पात्रता नहीं थी...अनपात्रता है. प्रभु की कृपा तो बनी रहती है वो पात्रता नहीं देखती, वो क्या जाने क्या देखती है? जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि नहीं, मैं तो यही कहूंगा कि प्रभु ने चुना है. आपको  मैं 14 जनवरी को उसमें आमंत्रित भी करता हूं.

रामकथा से नैतिकता और राष्ट्र के प्रति समर्पण:
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि देखिए 2 बातें होंगी, श्रीराम कथा सुनने से एक तो हमें नैतिक आचरण की प्रेरणा मिलेगी और दूसरा राष्ट्र के प्रति समर्पण मिलेगा, इन दोनों की हमें आवश्यकता है.