VIDEO: 86वां अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन संपन्न, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सम्मेलन में की शिरकत, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित 86वां अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन मंगलवार को सफलतापूर्वक संपन्न हो गया. तीन दिवसीय इस सम्मेलन में देशभर की विधायी संस्थाओं को अधिक पारदर्शी, कुशल और नागरिक-केंद्रित बनाने पर गहन विचार-विमर्श हुआ. 

सम्मेलन के समापन अवसर पर लोक सभा अध्यक्ष ने मीडिया से संवाद करते हुए कहा कि यह आयोजन केवल औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र को सशक्त बनाने का एक प्रभावी मंच है. उन्होंने सम्मेलन की सफल मेजबानी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार, विधान सभा और विधान परिषद के सहयोग के प्रति आभार जताया. सम्मेलन का उद्घाटन 19 जनवरी को उत्तर प्रदेश की राज्यपाल द्वारा किया गया था. साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए शुभकामना संदेश ने सम्मेलन को विशेष गरिमा प्रदान की.सम्मेलन के दौरान उद्घाटन और समापन सत्रों में राज्य सभा के उपसभापति, विधान परिषद के सभापति, विधान सभा अध्यक्ष तथा नेता प्रतिपक्ष सहित कई प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार रखे. 

विचार-विमर्श के बाद पीठासीन अधिकारियों ने सर्वसम्मति से छह महत्वपूर्ण संकल्प अंगीकृत किए.इन संकल्पों में वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में योगदान के लिए विधायी कार्यों के प्रति पुनः प्रतिबद्धता, राज्य विधायी निकायों की न्यूनतम 30 बैठकें प्रतिवर्ष सुनिश्चित करने, प्रौद्योगिकी के उपयोग को मजबूत करने, सहभागी शासन के लिए आदर्श नेतृत्व प्रदान करने, सांसदों-विधायकों की डिजिटल क्षमता बढ़ाने तथा शोध एवं अनुसंधान सहायता को सुदृढ़ करने जैसे विषय शामिल रहे. इसके साथ ही विधायी निकायों के कार्य-निष्पादन के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (नेशनल लेजिस्लेटिव इंडेक्स) के निर्माण का भी संकल्प लिया गया

सम्मेलन में तीन प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई-प्रौद्योगिकी के माध्यम से पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित विधायी प्रक्रियाएं, विधायकों की क्षमता-निर्माण, और जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही. इस दौरान राष्ट्रीय ई-विधान एप्लिकेशन (नेवा), डिजिटल संसद परियोजना, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रियल-टाइम अनुवाद, ई-नोटिस, ई-बैलटिंग और डिजिटल दस्तावेज प्रबंधन जैसे कदमों को लोकतंत्र को ‘ग्लास हाउस’ की तरह पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया गया.लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि पारदर्शिता केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की आधारशिला है. 

विधायकों की क्षमता-निर्माण को उन्होंने एक निरंतर प्रक्रिया बताया, जिसमें बजट की गहन समीक्षा, विधायी प्रारूपण, नई तकनीकों की समझ और आधुनिक नीति निर्माण की जटिलताओं को शामिल करना आवश्यक है. उन्होंने कहा कि जब सदन में तथ्यपरक और ज्ञान आधारित बहस होती है, तब सदन समाधान का मंच बनता है.सम्मेलन में यह भी स्पष्ट संदेश दिया गया कि सहमति और असहमति लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन टकराव नहीं. पीठासीन अधिकारियों ने सदनों के सुचारू संचालन, अनुशासन और निष्पक्षता बनाए रखने पर जोर दिया. साथ ही यह चिंता भी व्यक्त की गई कि कई राज्यों में विधानसभाओं की बैठकों की संख्या कम हो रही है, जो लोकतंत्र के लिए चुनौती है. 

इस सम्मेलन में 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के 36 पीठासीन अधिकारियों ने भाग लिया. छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, मणिपुर, तमिलनाडु, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल चुनाव या सत्रों के कारण शामिल नहीं हो सके. उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन की शुरुआत 1921 में हुई थी और यह चौथी बार है जब उत्तर प्रदेश को इसकी मेजबानी का अवसर मिला.