जयपुर: जिला अध्यक्षों के चयन औऱ उन्हें सियासी ताकत देने के लिए शुरू किया संगठन सृजन अभियान पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं. क्योंकि उड़ीसा में जिन दो विधायकों को जिला अध्यक्ष बनाया गया था उन्होंने क्रॉस वोटिंग कर दी. ऐसे में अब उनको हटाने की तैयारी है, वहीं निष्क्रियता के चलते गुजरात सहित कई राज्यों में कुछ जिला अध्यक्षों हटाने भी पड़े. वहीं कई लो प्रोफाइल चेहरे अब भी परफॉर्म नहीं कर पा रहे है.
लगातार तीन लोकसभा और कई राज्यों में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस आलाकमान ने संगठन को मजबूत बनाने का फैसला लिया. जिसके तहत जिला अध्यक्षों को ताकतवर बनाने के लिए संगठन सृजन मॉडल अपनाया गया. गुजरात में सबसे पहले इस अभियान का आगाज किया. अब तक करीब एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में यह मॉडल लागू हो चुका है जिसके जरिए 525 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति अभी तक हो चुकी है. हाल ही में छह और राज्यों में यह फार्मूला लागू किया है. इस मॉडल के पीछे राहुल गांधी का मकसद था दिग्गजों की सिफारिश के बिना जिला कप्तानों की नियुक्ति हो और उन्हें टिकट वितरण जैसी सियासी ताकत भी दी जाए. लेकिन अब धीरे धीरे इस फार्मूले पर सवाल खड़े होने लगे है.
कांग्रेस के संगठन सृजन मॉडल पर हुए सवाल खड़े
-उड़ीसा में दो विधायकों को बनाया गया था जिला अध्यक्ष
-पर दोनों विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में कर दी क्रॉस वोटिंग
-ऐसे में इन विधायकों को जिला अध्यक्ष बनाने से अभियान पर खड़े हुए सवाल
-क्योंकि वैचारिक प्रतिबद्धता सहित कईं मापदंडों पर हुआ था दोनों का चयन
-वहीं गुजरात सहित कई राज्यों में बदलने पड़े जिला अध्यक्ष
-अभियान के तहत कईं लो प्रोफाइल चेहरों को बनाया गया जिलाध्यक्ष
-लो प्रोफाइल जिला अध्यक्षों की दिग्गज नेताओं से नहीं बैठ रही पटरी
-कईं जिला अध्यक्ष अब भी पार्टी के निर्देशों पर नहीं उतर पा रहे है खरें
-कुछ जिला अध्यक्षों को तो एप पर डिटेल अपलोड की नहीं है तकनीकी जानकारी
-कईं जिला अध्यक्ष अब तक अपनी नई टीम का नहीं कर पाए गठन
-गुजरात के जूनागढ़ में 9 माह बाद हुई एक जिला अध्यक्ष की नियुक्ति
दरअसल राहुल गांधी ने पार्टी के थिंक टैंक की सलाह पर यह मॉडल लागू किया था. जिसके तहत दूसरे राज्यों के पर्यवेक्षक तैनात करके तीन-तीन नामों के पैनल बनवाए गए. यानी पूरी प्रक्रिया को पारदर्शिता से अंजाम दिया गया. उससे पहले बड़े नेताओं की सिफारिश पर ही जिला अध्यक्ष बनाने का पार्टी में रिवाज था. ऐसे में स्थापित और दिग्गजों को यह प्रक्रिया आखिर कैसे हजम होती. ऐसे में इस मॉडल के जरिए बने अध्यक्ष अलग थलग पड़ गए. अधिकतर जिला अध्यक्षों को वरिष्ठ नेताओं से किसी तरह का सहयोग ना के बराबर मिल रहा है. वहीं बाद में विधायकों,सांसदों औऱ अन्य वरिष्ठ नेताओं को इस अभियान के तहत जिला अध्यक्ष बनाने से भी मामला बिगड़ गया.
दरअसल यह मॉडल एक कॉरपोरेट कल्चर जैसा है. यानि चयन से लेकर जिला अध्यक्षों के कामकाज का का पूरा तरीका मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ जैसा है. ऐसे में कांग्रेस जैसी पार्टी में भला यह नवाचार इतना जल्दी कैसे एडजस्ट हो सकता है. हालांकि राहुल गांधी तक इस प्रक्रिया को लेकर लगातार कईं शिकायतें पहुंच रही है. पर राहुल गांधी पूरी तरह से संगठन सृजन के पक्ष में है और उनका साफ कहना है कि शेष राज्यों में भी इसे लागू किया जाएगा.