जयपुरः बीटू बाईपास स्थित बहुचर्चित श्रीराम कॉलोनी प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में है. राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से राजस्थान आवासन मंडल के पक्ष में फैसला दिए जाने के बावजूद अब तक जमीन पर कब्जा लेने की कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है. करीब 2200 करोड़ रुपये की बाजार कीमत वाली इस बहुमूल्य जमीन को लेकर बोर्ड की निष्क्रियता कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है.
हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद अभी तक मौके पर न तो आवासन मंडल की संपत्ति के बोर्ड लगाए गए हैं और न ही अवैध कब्जों को हटाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया गया है. इससे यह संदेश जा रहा है कि बोर्ड इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है, जबकि कानूनी स्थिति पूरी तरह उसके पक्ष में है.आवासन मंडल की ओर से कोर्ट में कैवियेट दायर की जा चुकी है, ताकि भविष्य में किसी भी संभावित अपील या याचिका की स्थिति में बोर्ड का पक्ष पहले सुना जा सके. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई का अभाव साफ़ नजर आ रहा है , इस पूरे मामले में आवासन मंडल के आयुक्त अरविंद पोसवाल का कहना है कि पहले कब्जाधारियों को नोटिस दिए जाएंगे, उसके बाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाएगी. हालांकि, प्रशासनिक और कानूनी विशेषज्ञ इस तर्क को कमजोर मानते हैं. उनका कहना है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जाधारियों को व्यक्तिगत नोटिस देना अनिवार्य नहीं होता. अत्यंत आवश्यक स्थिति में केवल दो दिन का सार्वजनिक नोटिस जारी कर भी अतिक्रमण हटाया जा सकता है. मौके से अतिक्रमण हटाना इसलिए भी आवासन मंडल के लिए आसान और निर्विवादित है क्योंकि अधिकतर प्लॉट्स पर सिर्फ बाउंड्रीवाल ही बनी हुईं हैं , मौके पर लोगों का रहवास नहीं है इसलिए अगर आवासन मंडल चाहे तो जल्द से जल्द कब्जा लिया जा सकता है
इसी संदर्भ में जयपुर विकास प्राधिकरण का उदाहरण दिया जा रहा है, जो इसी प्रक्रिया के तहत सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करता है. ऐसे में आवासन मंडल की धीमी कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है.स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक ढिलाई या किसी स्तर पर दबाव के चलते कार्रवाई को टाला जा रहा है. हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जमीन की बड़ी कीमत और लंबे समय से चल रहे विवाद को देखते हुए यह मामला संवेदनशील बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब न्यायालय का निर्णय स्पष्ट है, तो उसे लागू करने में देरी न केवल सरकारी तंत्र की कार्यक्षमता पर सवाल उठाती है, बल्कि इससे अवैध कब्जाधारियों के हौसले भी बढ़ते हैं. यदि जल्द ही ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला एक बार फिर विवादों और आलोचनाओं का केंद्र बन सकता है.अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर आवासन मंडल किसके निर्देशों का इंतजार कर रहा है, और कब तक करोड़ों की सरकारी जमीन यूं ही कब्जे में बनी रहेगी.