जयपुर: राजस्थान में उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए शुरू किए गए राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसाइटी (राजसेस) के 374 महाविद्यालयों में बुनियादी ढांचा लगभग तैयार हो चुका है, लेकिन स्थायी स्टाफ की कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. वर्ष 2021 से 2025 के बीच स्थापित इन कॉलेजों के लिए राज्य सरकार ने प्रति कॉलेज 4.50 करोड़ रुपए भवन निर्माण हेतु स्वीकृत किए थे. 90 फीसदी कॉलेजों के भवन तैयार हो चुके हैं और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अलग से ग्रांट भी जारी की गई है. बावजूद इसके इन संस्थानों में शिक्षा व्यवस्था अस्थायी व्यवस्थाओं पर टिकी हुई है. पढ़ाई का जिम्मा अभी भी विद्या संबल योजना के तहत लगे गेस्ट फैकल्टी के पास है, जबकि गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए कर्मचारी प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं. केवल प्राचार्य और लेखा संवर्ग के पदों पर ही स्थायी नियुक्तियां की गई हैं.
ढांचा मजबूत, लेकिन मानव संसाधन कमजोर :
- 374 राजसेस कॉलेज संचालित
- 90% से अधिक भवन निर्माण पूर्ण
- 95% कॉलेजों के पीडी अकाउंट खुले
- इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अलग से ग्रांट जारी
- 3540 शैक्षणिक और 1184 गैर-शैक्षणिक पद स्वीकृत
- फिर भी गेस्ट फैकल्टी और प्रतिनियुक्ति पर निर्भरता
अखिल राजस्थान उच्च शिक्षा मंत्रालयिक कर्मचारी संघ (अरुस्मा) ने अब इन कॉलेजों को राजकीय कॉलेजों में परिवर्तित करने और सभी पदों पर नियमित भर्ती की मांग उठाई है. संघ के सदस्य भावेश कुमार शर्मा ने बताया कि इस संबंध में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं. उन्होंने कहा कि संविदा नियुक्तियां कोई स्थायी समाधान नहीं हैं और इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है. राजसेस कॉलेजों में स्थायी स्टाफ की नियुक्ति जरूरी है. संविदा पर नियुक्तियां शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करती हैं. सरकार को राजकीय कॉलेजों की तर्ज पर सभी पदों पर नियमित भर्ती करनी चाहिए, ताकि विभाग को स्थायी मानव संसाधन मिल सके.
वहीं, बेरोजगार यूनियन ने भी सरकार के प्रस्तावित संविदा भर्ती मॉडल का विरोध किया है. यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष हनुमान किसान ने कहा कि सरकार उच्च शिक्षा में करीब 5000 पदों पर संविदा नियुक्ति की तैयारी कर रही है, जिसे उन्होंने 'शिक्षा वीर' मॉडल करार दिया. जिस तरह सेना में अग्निवीर लाए गए, उसी तरह शिक्षा में 'शिक्षा वीर' लाने की तैयारी है. ये छात्रों और बेरोजगार युवाओं दोनों के साथ अन्याय है. सरकार को स्थायी भर्ती करनी चाहिए, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता भी सुधरे और युवाओं को रोजगार भी मिले.
राजसेस कॉलेजों में 3540 शैक्षणिक और 1184 गैर-शैक्षणिक पदों पर भर्ती को वित्त विभाग से मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन कर्मचारी चयन बोर्ड ने फिलहाल इस प्रक्रिया पर रोक लगा रखी है. बोर्ड ने कई तकनीकी और प्रशासनिक सुझाव दिए हैं, जिनमें प्रमुख रूप से पदों के वर्गीकरण, सेवा नियमों की स्पष्टता और राजपत्रित-अराजपत्रित पदों की स्थिति स्पष्ट नहीं होना शामिल है. इसके अलावा, संविदा भर्ती की प्रक्रिया शुरू होने से नियमित भर्ती प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई है. यही कारण है कि फिलहाल इन भर्तियों पर ब्रेक लगा हुआ है. बहरहाल, स्थायी शिक्षकों और कर्मचारियों के अभाव में इन कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. गेस्ट फैकल्टी की अस्थिरता और सीमित जवाबदेही के कारण छात्रों के भविष्य को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं. ऐसे में राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है. एक ओर उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए बनाए गए ढांचे को प्रभावी बनाना और दूसरी ओर बेरोजगार युवाओं को रोजगार के अवसर देना.
कर्मचारी संगठन और बेरोजगार यूनियन के बढ़ते दबाव के बीच अब ये देखना अहम होगा कि सरकार संविदा मॉडल पर आगे बढ़ती है या स्थायी भर्ती के जरिए इस व्यवस्था को मजबूत करती है.