एक परंपरा....जो आज भी अधूरी ! जैसलमेर की गवर को आज भी ईसर का इंतजार, देखिए खास रिपोर्ट

जयपुरः पश्चिमी राजस्थान के सुनहरे धोरों के बीच बसा जैसलमेर अपनी विरासत, परंपराओं और अनोखी संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है.लेकिन इसी जैसलमेर में एक ऐसी परंपरा भी है. जो सदियों से चली आ रही है. और आज भी अधूरी है. यह कहानी है गणगौर की. जहां पूरे राजस्थान में गणगौर पर ईसर-गवर की पूजा होती है. वहीं जैसलमेर में गवर माता आज भी अकेली हैं. क्योंकि यहां की गणगौर सवारी.  बिना ईसर के निकलती है. आखिर क्या है इसके पीछे का इतिहास. 

राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में गणगौर का पर्व विशेष स्थान रखता है. यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि लोक-आस्था, प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का प्रतीक है.आजादी से पहले जब पूरा राजपूताना विभिन्न रियासतों में बंटा हुआ था, तब हर रियासत में गणगौर का त्योहार राजसी ठाठ-बाट के साथ मनाया जाता था.राजा-महाराजा, रानियां, पटरानियां और आम प्रजा—सभी इस उत्सव में शामिल होते थे. यह पर्व लोक-मन की भावनाओं को उत्सव और उल्लास के साथ अभिव्यक्त करने का माध्यम था.जैसलमेर रियासत में भी गणगौर बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती थी. लेकिन एक फर्क के साथ. यहां गवर की सवारी.  बिना ईसर के निकलती थी. और आज भी निकलती है. 

इतिहासकार तनेसिंह सोढ़ा इस परंपरा के पीछे की कहानी को विस्तार से बताते हैं. उनके अनुसार यह घटना 17वीं सदी की है. वर्ष 1631 ईस्वी के आसपास. उस समय जैसलमेर में महारावल मनोहरदास का शासन था. और दूसरी ओर बीकानेर में महाराजा कर्णसिंह राज कर रहे थे. बताया जाता है कि जैसलमेर के सिरड़ा गांव के भाटी समुदाय के कुछ लोगों ने बीकानेर राज्य की गणगौर प्रतिमा का अपहरण कर लिया. बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह ने इसे अपने राज्य का अपमान माना. और इसे स्त्री अपहरण के समान गंभीर घटना समझा. इसके बाद बीकानेर दरबार में बदला लेने की योजना बनाई गई. 

तनेसिंह सोढ़ा के अनुसार. 1632 ईस्वी में बीकानेर के योद्धा लाखणसिंह के नेतृत्व में एक दल तैयार किया गया. जब जैसलमेर की राजकीय गणगौर सवारी किले से निकल रही थी. तभी अचानक इस सवारी पर छद्म हमला किया गया. हमला अचानक था. लेकिन जैसलमेर के भाटी वीरों ने बहादुरी से मुकाबला किया. उन्होंने गवर माता की प्रतिमा को तो बचा लिया. लेकिन इस संघर्ष के दौरान एक बड़ी घटना हो गई. बीकानेर के सैनिक गवर माता के पति. ईसर. यानी भगवान भगवान शिव की प्रतिमा को अपने साथ ले जाने में सफल हो गए. और यही वो क्षण था. जब से जैसलमेर की गणगौर अधूरी हो गई. 

इस घटना के बाद बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह ने लाखणसिंह को सम्मानित किया और उन्हें जागीर प्रदान की. लेकिन जैसलमेर के लिए यह घटना एक स्थायी विरह बन गई. सबसे बड़ा सवाल था. क्या ईसर की नई प्रतिमा बनाई जाएगी?लेकिन जैसलमेर राजपरिवार और समाज ने एक ऐसा निर्णय लिया. जो आज भी इस परंपरा की आत्मा है. भारतीय संस्कृति में एक पत्नी अपने पति के स्थान पर किसी और को स्वीकार नहीं करती. इसी भावना के चलते. गवर माता के लिए नए ईसर की प्रतिमा नहीं बनाई गई. और तब से. गवर माता अकेली ही पूजी जाने लगीं. 

आज भी जब गणगौर का पर्व आता है. तो जैसलमेर किला से गवर की शाही सवारी पूरे वैभव के साथ निकलती है. अखेविलास महल और आईनाथ मंदिर में पूजा के बाद. रानियां, महारानियां और भाटी कुल की महिलाएं गवर माता की प्रतिमा को सिर पर उठाकर गड़ीसर तक ले जाती हैं. सबसे आगे नगाड़ों की गूंज. फिर सजे-धजे ऊंट, घोड़े मंगणियारों का संगीत. और लोक कलाकारों का प्रदर्शन. इस भव्य लवाजमे के बीच. गवर माता की सवारी निकलती है. 

इस शाही सवारी में केवल राजपरिवार ही नहीं. बल्कि पूरा शहर शामिल होता है. ठिकानेदार, जमींदार, आम लोग—सभी इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं. सड़कें दर्शकों से भर जाती हैं. लोग छतों से फूल बरसाते हैं. गवर माता की सवारी धीरे-धीरे गड़ीसर झील पहुंचती है. जहां विधिवत पूजा की जाती है. इसके बाद गवर को पानी पिलाने की परंपरा निभाई जाती है. और फिर सवारी वापस किले की ओर लौट जाती है. 

एक और खास बात यह है कि जहां पूरे राजस्थान में गणगौर तीज को मनाई जाती है. वहीं जैसलमेर में यह सवारी चौथ के दिन निकलती है. इसके पीछे भी ऐतिहासिक कारण है. रियासतकाल में सभी ठिकानों में तीज को ही सवारी निकलती थी. इसलिए जैसलमेर राजपरिवार ने चौथ का दिन तय किया. ताकि सभी ठिकानेदार इस शाही आयोजन में शामिल हो सकें. 

चार सौ साल. कई पीढ़ियां गुजर गईं. लेकिन गवर माता का इंतजार आज भी खत्म नहीं हुआ. वो आज भी सजती हैं. शाही सवारी में निकलती हैं. पूजा होती है. लेकिन उनके साथ नहीं होता उनका ईसर. यह सिर्फ एक परंपरा नहीं. बल्कि आस्था, प्रेम और प्रतीक्षा की वो कहानी है. जो जैसलमेर को पूरे राजस्थान में सबसे अलग बनाती है. 

जैसलमेर की यह अनोखी गणगौर हमें इतिहास के उस अध्याय से रूबरू कराती है. जहां परंपरा केवल निभाई नहीं जाती. बल्कि जी जाती है. गवर माता का यह इंतजार आज भी जारी है. और शायद यही इंतजार. इस परंपरा को अमर बना देता है