जयपुर: जयपुर की झुलसाती दोपहरों में, जहां सूरज की तपिश इंसान को छांव तलाशने पर मजबूर कर देती है, वहीं 102 वर्षीया एक वृद्धा पिछले तीन दशकों से अपने कांपते हाथों से राहगीरों की प्यास बुझा रही हैं. उम्र की थकान उनके कदमों की गति को भले ही थोड़ा धीमा कर चुकी हो, लेकिन सेवा का दीप आज भी उनके भीतर उतनी ही आस्था से जल रहा है. प्याऊ पर रखा मिट्टी का मटका, उनकी ममता और करुणा का मानो जीवंत प्रतीक बन गया है. आईये हमारे एसोसिएट एडिटर नरेश शर्मा की इस रिपोर्ट में आपको दिखाते हैं मानवता, धर्म और संवेदना की वह अमिट कथा, जो समाज को सेवा का असली अर्थ समझाती है.
यह है प्रदेश के जलदाय विभाग का मुख्यालय जल भवन,,,, ईंट, पत्थर व कंक्रीट से बनी इसी इमारत में सरकारी मुलाजिम प्रदेशभर की जनता की प्यास बुझाने की योजनाओं की रूपरेखा गढ़ते हैं, कई मंत्री-संतरी आए, चले गए. मोटी तनख्वाह वाले अधिकारी एयरकंडीनर कमरों में गद्देदार कुर्सियों पर बैठकर कलम से कागजों में पानी पीलाते रहे, लेकिन उसी जल भवन के प्रवेश द्वार पर एक छोटे सी प्याऊ पर 102 वर्षीया वृद्धा निस्वार्थ भाव से जल सेवा में जुटी हैं. यहां न पंखा है और न ही कोई मखमली चद्दर. बस पत्थर की पट्टियों पर बैठकर समय की झुर्रियों से भरा यह चेहरा, काँपते हाथ और धुंधली पड़ती दृष्टि के बावजूद अपने भीतर सेवा का निर्मल सरोवर आज भी अविरल बहा रहा है. तपती दोपहरी में आने-जाने वालों को वे मुस्कान के साथ पानी पिलाती हैं. आधुनिक व्यवस्थाओं और सरकारी योजनाओं के बीच यह वृद्धा मानो मानवता, करुणा और सेवा-संस्कार की जीवित प्रतिमा बन गई हैं. तीन दशक से सेवा में जुटी इस ममतामयी मूर्त का नाम है - रेशम. स्वभाव भी रेशम सा मुलायम और मन को छू लेने वाला सरल सा. वैसे तो दौसा जिले में सिंकदरा के पास गांव की रहने वाली है, लेकिन परिवार अब जयपुर में ही बस गया है. यह सरकारी दस्तावेज उनके सौ साल पार होने की गवाही दे रहा है. 1924 में पैदा हुई रेशम देवी का दिन उम्र के इस अंतिम पड़ाव पर भी प्याऊ पर बैठकर लोगों को नि:शुल्क पानी पिलाने से शुरू होता है. अगर कोई राहगीर या जलभवन का कोई कर्मचारी श्रद्धा भाव से कोई राशि देता है, तो अलग बात है, वरना देर शाम तक बिना रुके बिना थके राहगीरों की प्यास बुझाकर मानवता की मिसाल कायम कर रही हैं. रेशम की प्याऊ पर आने की कहानी भी कम रोचक नहीं है. पहले रेशम अपने परिवार के साथ पास ही हसनपुरा में रहती थी. रेशम से पहले एक महिला यहां प्याऊ पर जल सेवा करती थी. एक बार महिला को अपने परिवार में विवाह समारोह में शहर से दूर जाना था, तो उसने अपनी सखी रेशम देवी से आग्रह किया कि दो-तीन दिन आप यहां बैठ जाना, ताकि कोई राहगीर प्यासा न जाए. बस सेवा का भाव मन में लिए रेशम देवी यहां बैठ गई. आज तक वह महिला तो वापिस नहीं लौटी, लेकिन रेशम देवी उस दिन से आज तक उसी तन्मयता से सेवा भाव में जुटी है. रेशम देवी कहती है कि मैं माया की भूखी नहीं हूं.
रेशम देवी के तीन पुत्र है. एक बेटा पुलिस सेवा से रिटायर्ड है. पहले हसनपुरा से प्याऊ पर आती थी, लेकिन अब लालरपुरा से करीब नौ किमी की यात्रा करके प्याउ तक आती है. रेशम देवी कहती है कि बेटे उम्र को देखते हुए अब आने से मना तो करते हैं, लेकिन मैंने भी कह दिया कि जब तक जान है मैं सेवा करती रहूंगी.
55 साल पहले रेशम देवी के पति का निधन हो गया था. रेशम देवी कहती है कि सड़कों पर गड्ढे खोदकर बच्चों को पाला और लायक बनाया है. सौ साल पार की रेशम देवी ने अब अपने जीवन का अधिकांश समय जन सेवा में लगा दिया है, धर्म के प्रति आस्था तो इनके रग रग में बसी है. रेशम देवी अब तक देश के कई धार्मिक स्थलों की यात्रा कर चुकी है, 20 बार हरिद्वार में मां गंगा इनको बुला चुकी है. अब उनकी इच्छा है रामेश्वर में भगवान शिव की पूजा करना.
स्थानीय लोग और जलदाय विभाग के कर्मचारी बताते हैं कि रेशम देवी ने कभी भी इस सेवा को बोझ नहीं माना. भीषण गर्मी, बरसात या सर्दी—हर मौसम में वे नियमित रूप से प्याऊ पर पहुंचती हैं. राहगीरों के लिए वे केवल पानी देने वाली बुजुर्ग महिला नहीं, बल्कि मां जैसी ममता और अपनापन बांटने वाली प्रेरणा बन चुकी हैं. जलदाय विभाग के कर्मचारियों ने रेशम देवी को इनके योगदान के लिए सम्मानित भी किया और उनसे प्रेरणा लेकर अन्य जगह प्याऊ शुरू करने का संकल्प लिया.
हर आने-जाने वाले को पानी पिलाते हुए रेशम देवी के चेहरे पर जो संतोष झलकता है, वह बताता है कि इंसानियत आज भी सांस ले रही है. राजस्थान की भीषण गर्मी में प्याऊ लगाना केवल सेवा नहीं, बल्कि बड़ा धार्मिक और पुण्य का कार्य माना जाता है. प्याऊ में मटके का पानी केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है. मिट्टी के मटके में रखा पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता है, जिससे शरीर को राहत मिलती है और गर्मी से बचाव होता है. इसमें किसी प्रकार की कृत्रिम ठंडक नहीं होती, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है. धार्मिक दृष्टि से भी मटके का पानी सेवा, सादगी और पुण्य का प्रतीक है. पुराने समय में राहगीरों के लिए प्याऊ पर मिट्टी के घड़ों में पानी रखा जाता था, ताकि हर व्यक्ति सहजता से अपनी प्यास बुझा सके. मिट्टी की सोंधी खुशबू वाला यह पानी लोगों को अपनापन और गांव की परंपरा का एहसास कराता है. खुद 102 वर्षीय रेशम का मानना है कि मटके का पानी ही पीना चाहिए.
भारतीय संस्कृति में प्यासे को पानी पिलाना सबसे श्रेष्ठ दान बताया गया है. जयपुर सहित पूरे राजस्थान में गर्मियों के दौरान लोग राहगीरों, मजदूरों और जरूरतमंदों के लिए प्याऊ लगाकर जल सेवा करते हैं. मान्यता है कि जलदान से पुण्य की प्राप्ति होती है और यह मानवता की सबसे बड़ी सेवा मानी जाती है. यहां समाजसेवी, व्यापारी और धार्मिक संस्थाएं हर वर्ष जगह-जगह प्याऊ संचालित करती हैं. पुराने समय में जयपुर शहर में आमजन और यात्रियों की सुविधा के लिए कई पारंपरिक व्यवस्थाएं होती थीं. गर्मियों में जगह-जगह प्याऊ लगाई जाती थीं, जहां मुफ्त में ठंडा पानी और शरबत पिलाया जाता था. शहर के चौक, बाजार और मंदिरों के पास कुएं, बावड़ियां और टांके बनाए जाते थे, ताकि लोगों को पानी की कमी न हो. आज, जब स्वार्थ और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग एक-दूसरे के लिए समय निकालने से कतराते हैं, तब यह वृद्धा नि:स्वार्थ सेवा का जीवंत उदाहरण हैं. उनकी यह तपस्या साबित करती है कि इंसान की असली पहचान उसके धन या उम्र से नहीं, बल्कि उसके कर्म और सेवा भाव से होती है. यह प्याऊ केवल पानी बांटने का स्थान नहीं, बल्कि करुणा, धर्म और संस्कारों की वह पाठशाला है, जहां हर व्यक्ति सेवा का अर्थ सीख सकता है.