जयपुरः राजस्थान में भारी वाहन चालकों को प्रशिक्षण देने के नाम पर बड़े स्तर पर गड़बड़ियों और फर्जीवाड़े का मामला सामने आ रहा है. प्रदेश में संचालित मोटर ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूलों की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है. बड़ी संख्या में ड्राइविंग स्कूल बिना वास्तविक प्रशिक्षण दिए ही आवेदकों को Form-5 प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं, जबकि यही प्रमाण पत्र भारी वाहन ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है.
प्रदेश में वर्तमान में 331 एक्टिव ड्राइवर ट्रेनिंग स्कूल संचालित हैं. इनमें से लगभग 250 स्कूल भारी वाहन यानी ट्रक और बस चालकों को प्रशिक्षण देने का दावा करते हैं. नियमों के अनुसार किसी भी आवेदक को भारी वाहन लाइसेंस प्राप्त करने से पहले कम से कम 30 दिन का प्रशिक्षण और 15 घंटे का प्रायोगिक ड्राइविंग प्रशिक्षण लेना अनिवार्य है. इसके बाद ही संबंधित ड्राइविंग स्कूल द्वारा Form-5 प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता है.लेकिन कई स्कूल केवल OTP सत्यापन के आधार पर प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं. आवेदकों को न तो वास्तविक ड्राइविंग प्रशिक्षण दिया जा रहा है और न ही निर्धारित अवधि तक वाहन चलाने का अभ्यास कराया जा रहा है. इसके बावजूद उन्हें भारी वाहन चलाने के लिए पात्र घोषित कर दिया जाता है. आंकड़े इस पूरे मामले की गंभीरता को और बढ़ा देते हैं. जानकारी के अनुसार पिछले एक वर्ष में इन ड्राइविंग स्कूलों द्वारा करीब 90 हजार आवेदकों को Form-5 प्रमाण पत्र जारी किए गए. यदि इसे औसत के रूप में देखा जाए तो एक स्कूल ने लगभग 360 प्रमाण पत्र जारी किए. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन सभी आवेदकों को नियमानुसार प्रशिक्षण दिया गया होता तो प्रदेशभर में लगभग 4500 प्रशिक्षण वाहन — ट्रक और बस — उपलब्ध होने चाहिए थे. यानी प्रत्येक स्कूल के पास औसतन 18 प्रशिक्षण वाहन होने जरूरी थे.
कई स्कूलों के पास पर्याप्त वाहन, प्रशिक्षक और प्रशिक्षण मैदान तक उपलब्ध नहीं हैं. इसके बावजूद बड़ी संख्या में प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं. यही कारण है कि अब पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल उठ रहे हैं. कई ड्राइविंग स्कूल एक आवेदक से 8 से 10 हजार रुपये तक वसूल रहे हैं. यदि पिछले वर्ष जारी किए गए 90 हजार प्रमाण पत्रों का औसत निकाला जाए तो बिना वास्तविक प्रशिक्षण के करीब 72 करोड़ रुपये की कमाई किए जाने का अनुमान सामने आता है.मामले में परिवहन विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है. आरोप है कि विभाग के पास ड्राइविंग स्कूलों की निगरानी के लिए कोई प्रभावी मैकेनिज्म नहीं है. प्रशिक्षण वास्तव में हुआ या नहीं, इसकी जमीनी स्तर पर कोई सख्त जांच नहीं होती. कई मामलों में RTO और DTO स्तर तक मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है. अब जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकार और परिवहन विभाग इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए, ड्राइविंग स्कूलों का भौतिक सत्यापन करवाए और बिना प्रशिक्षण प्रमाण पत्र जारी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे. क्योंकि यह मामला केवल लाइसेंस जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे आम लोगों की जान और सड़क सुरक्षा से जुड़ा हुआ है.