जयपुर : सनातन संस्कृति में प्रकृति को देवी का ही स्वरूप माना गया है. यही कारण है कि पूजा-पाठ और अनुष्ठानों में पेड़-पौधों का विशेष महत्व रहा है. चैत्र नवरात्र के अवसर पर यह परंपरा और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब प्रकृति स्वयं नव शृंगार करती है और इसी शृंगार के माध्यम से मां दुर्गा की उपासना का एक सरल मार्ग भी सामने आता है. वेदाचार्य योगेश पारीक के अनुसार नवरात्र केवल व्रत, जप और अनुष्ठान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का पर्व भी है. और यदि कोई व्यक्ति विधि-विधान से पूजा नहीं कर पाता, तो वो माता के नवस्वरूप से जुड़े औषधीय पौधे लगाकर उनका पूजन करके भी मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकता है.
चैत्र नवरात्र के समय प्रकृति में नए पत्ते, फूल और हरियाली का आगमन होता है. इसे देवी के आगमन का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि जो साधक इन दिनों प्रकृति के इस रूप का सम्मान करते हैं, उन्हें जल्द सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं. वेदाचार्य योगेश पारीक ने बताया कि घर में पौधे लगाने से न केवल वातावरण शुद्ध होता है, बल्कि मानसिक शांति और ऊर्जा का संचार भी होता है. साथ ही, यदि घर में किसी प्रकार का वास्तु दोष हो, तो वो भी कम हो जाता है. धर्म शास्त्रों में नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ नौ विशेष औषधीय पौधों का उल्लेख मिलता है. इन पौधों को एक साथ लगाकर दुर्गा वाटिका भी बनाई जा सकती है. इसे घर के आंगन, छत या गमलों में भी आसानी से लगाया जा सकता है. और यदि इन पौधों को किसी मंदिर परिसर में लगाया जाए, तो इसका लाभ समाज के अन्य लोगों को भी मिलता है.
नवदुर्गा और उनके औषधीय पौधे :
• मां शैलपुत्री - हरड़
हरड़ एंटीऑक्सिडेंट गुणों से भरपूर होती है. यह पाचन तंत्र को मजबूत करती है. सूजन, बवासीर, खांसी, पीलिया और एसिडिटी जैसी समस्याओं में भी लाभकारी है.
• मां ब्रह्मचारिणी - ब्राह्मी
ब्राह्मी स्मरण शक्ति बढ़ाने, मानसिक शांति और रक्त विकारों के उपचार में उपयोगी मानी जाती है.
• मां चंद्रघंटा - चंद्रशूर
चंद्रशूर का पौधा विटामिन C का अच्छा स्रोत है. ये खांसी और कब्ज में लाभ देता है.
• मां कुष्मांडा - पेठा
पेठा रक्त शुद्धि और शरीर को ठंडक देने के लिए उपयोगी माना जाता है.
• मां स्कंदमाता - अलसी
अलसी वात, पित्त और कफ को संतुलित करने में सहायक होती है और शरीर को पोषण देती है.
• मां कात्यायनी - मोइया
मोइया का पौधा कफ और गले के रोगों में विशेष लाभकारी बताया गया है.
• मां कालरात्रि - नागदौन
नागदौन मानसिक विकारों, बवासीर और मस्तिष्क संबंधी समस्याओं में उपयोगी है.
• मां महागौरी - तुलसी
तुलसी को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. ये हृदय रोग, रक्त विकार और इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक है.
• मां सिद्धिदात्री - शतावरी
शतावरी बल, बुद्धि और मानसिक संतुलन को बढ़ाने वाली औषधि के रूप में जानी जाती है.
नवरात्र में इन पौधों की स्थापना और सेवा करना केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का भी एक सशक्त माध्यम है. ये परंपरा बताती है कि सनातन संस्कृति में प्रकृति और मानव जीवन एक-दूसरे के पूरक हैं. खास बात ये है कि घर में गमलों में भी 'दुर्गा वाटिका' बनाई जा सकती है. इससे रोज पौधों को जल अर्पित कर पूजा की जा सकती है. इसके अलावा मंदिर परिसर में पौधे लगाकर सामूहिक पुण्य भी प्राप्त किया जा सकता है.
बहरहाल, नवरात्र का पर्व केवल देवी आराधना का नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है. औषधीय पौधों के माध्यम से की गई ये पूजा न केवल आध्यात्मिक संतोष देती है, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीवन संतुलन का भी मार्ग प्रशस्त करती है.