भारत-पाक बॉर्डर पर दिखा दुर्लभ 'कैराकल', कैमरा ट्रैप में कैद हुई दुर्लभ तस्वीरें, देखिए खास रिपोर्ट

जयपुरः भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे थार के तपते रेगिस्तान से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश की जैव विविधता के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है.जैसलमेर के सीमावर्ती घोटारू इलाके में एक बार फिर दुर्लभ और विलुप्तप्राय जंगली बिल्ली—कैराकल, जिसे स्थानीय भाषा में ‘पड़ंग’ कहा जाता है—की मौजूदगी के पुख्ता संकेत मिले हैं. सबसे अहम बात ये है कि पूरे भारत में इस प्रजाति की संख्या 50 से भी कम मानी जाती है. ऐसे में सरहद के इस सन्नाटे में इनकी हलचल एक बहुत बड़ा संकेत है.कैमरा ट्रैप और रेडियो कॉलर के जरिए इन पर 24 घंटे नजर रखी जा रही है. और वैज्ञानिक भी इसके व्यवहार को समझने में जुटे हैं.तो क्या थार का रेगिस्तान अब इस दुर्लभ शिकारी का आखिरी ठिकाना बनता जा रहा है. 

जैसलमेर के भारत-पाक बॉर्डर से सटे घोटारू क्षेत्र में जब वन विभाग ने मोशन सेंसिंग कैमरा ट्रैप लगाए. तो शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि ये कैमरे इतनी बड़ी खबर लेकर आएंगे. इन कैमरों में कैद हुईं तस्वीरों और वीडियो ने साफ कर दिया कि इस इलाके में न सिर्फ एक. बल्कि दो नए कैराकल सक्रिय हैं. इसके अलावा पहले से रेडियो कॉलर लगे एक कैराकल की गतिविधियां भी लगातार रिकॉर्ड की जा रही हैं.यानी अब तक इस सीमावर्ती इलाके में कुल तीन कैराकल की मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी है. रेगिस्तान की खामोशी में ये हलचल सिर्फ एक वन्यजीव की मौजूदगी नहीं. बल्कि एक ऐसी प्रजाति के जिंदा होने का सबूत है, जो धीरे-धीरे भारत से गायब होती जा रही है.

इस पूरे ऑपरेशन को बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. जोधपुर के मुख्य वन संरक्षक अनूप के.आर. के मार्गदर्शन में और जैसलमेर के आईजीएनपी-II डिवीजन के डीएफओ देवेंद्र सिंह भाटी के नेतृत्व में वन विभाग की टीम दिन-रात इनकी निगरानी कर रही है. घोटारू, रामगढ़ और शाहगढ़ क्षेत्र में रणनीतिक स्थानों पर हाई-टेक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं. जो हल्की सी मूवमेंट को भी कैद कर लेते हैं.इन कैमरों की खासियत यह है कि ये रात के अंधेरे में भी इंफ्रारेड तकनीक के जरिए साफ तस्वीरें रिकॉर्ड करते हैं. जिससे इस निशाचर शिकारी की गतिविधियों को समझना आसान हो जाता है.इसके साथ ही रेडियो कॉलर से लैस कैराकल की लोकेशन सैटेलाइट के जरिए ट्रैक की जा रही है. जिससे उसके मूवमेंट, शिकार के पैटर्न और रहने के क्षेत्र की सटीक जानकारी मिल रही है.वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की विशेषज्ञ टीम भी इस पूरे मिशन में जुटी है. और थार के इकोसिस्टम में कैराकल की भूमिका को वैज्ञानिक तरीके से समझने की कोशिश कर रही है.

विशेषज्ञों की मानें तो जैसलमेर का रामगढ़-शाहगढ़ क्षेत्र इस वक्त भारत में कैराकल की आखिरी सुरक्षित पनाहगाहों में से एक बन चुका है.यह इलाका शुष्क घासभूमि का एक अनोखा उदाहरण है. जहां चिंकारा, खरगोश और कई तरह के छोटे जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. यही जीव कैराकल के लिए प्रमुख शिकार का आधार बनते हैं. और यही कारण है कि यह दुर्लभ शिकारी अब भी यहां टिके रहने में सफल हो रहा है. पिछले एक साल में इस क्षेत्र में इसके पैरों के निशान, शिकार के अवशेष और कैमरा ट्रैप में कैद गतिविधियों ने यह साफ कर दिया है कि यह प्रजाति अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. बल्कि संघर्ष कर रही है.

लेकिन इस उम्मीद के बीच एक बेहद चिंताजनक खबर भी सामने आई. जैसलमेर के बाछिया इलाके में एक कैराकल का शिकार कर उसे जलाने की कोशिश की गई. ताकि साक्ष्य मिटाए जा सकें. यह घटना सिर्फ एक वन्यजीव की मौत नहीं. बल्कि उस सोच को भी उजागर करती है, जहां इंसान अपने हितों के लिए प्रकृति के संतुलन को नजरअंदाज कर देता है. दरअसल, कैराकल कभी-कभी भेड़-बकरियों का शिकार करता है. जिससे ग्रामीण इसे अपने पशुधन के लिए खतरा मान लेते हैं.और यही डर कई बार हिंसक घटनाओं का कारण बन जाता है. जो इस प्रजाति के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहा है.

थार के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए पशुधन ही उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत है. ऐसे में जब ‘पड़ंग’ उनके जानवरों का शिकार करता है. तो यह सिर्फ एक वन्यजीव हमला नहीं, बल्कि उनके जीवन पर सीधा असर होता है. यही वजह है कि कई बार गुस्से और डर में लोग इस दुर्लभ जानवर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस संघर्ष को समय रहते नहीं रोका गया. तो आने वाले समय में कैराकल पूरी तरह से भारत से गायब हो सकता है.

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग अब सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं है. बल्कि जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान भी चला रहा है. डीएफओ देवेंद्र भाटी और उनकी टीम सीमावर्ती ढाणियों में जाकर ग्रामीणों को समझा रही है कि कैराकल को नुकसान पहुंचाना गैरकानूनी है. और इससे पर्यावरणीय संतुलन पर भी बुरा असर पड़ता है. ग्रामीणों से यह भी अपील की जा रही है कि यदि यह जानवर उनके पशुओं पर हमला करता है. तो वे तुरंत वन विभाग को सूचना दें.विभाग ने आश्वस्त किया है कि ऐसे मामलों में कैराकल को सुरक्षित तरीके से पकड़कर दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाएगा. ताकि इंसान और वन्यजीव दोनों सुरक्षित रह सकें.

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के विशेषज्ञों और वन विभाग की संयुक्त टीम ने इस जटिल ऑपरेशन को अंजाम दिया.विशेषज्ञों के अनुसार, कैरेकल बेहद शर्मीला और फुर्तीला वन्यजीव है, जिसे देख पाना भी मुश्किल होता है.यह बिल्ली छलांग लगा कर हवा में उड़ रहे पक्षियों का शिकार लेती है.रेडियो कॉलर लगने के बाद अब इस जीव की गतिविधियों, शिकार के तरीके और उनके आवास के बारे में सटीक वैज्ञानिक डेटा मिल सकेगा. कैरेकल, जिसे स्थानीय भाषा में 'सियागोश' भी कहा जाता है, भारत में विलुप्ति की कगार पर है. वर्तमान में यह मुख्य रूप से राजस्थान के कच्छ और थार रेगिस्तान के कुछ हिस्सों में ही पाया जाता है.रेडियो सिग्नल के जरिए अब हर पल यह पता चलेगा कि कैरेकल कहां जा रहा है. प्राप्त डेटा से यह समझने में मदद मिलेगी कि इस प्रजाति को बचाने के लिए भविष्य में किस तरह के नीतिगत बदलाव जरूरी हैं. साथ ही लगातार मॉनिटरिंग से शिकारियों और अन्य खतरों से इसे सुरक्षित रखा जा सकेगा. 

कैराकल – रहस्यमयी शिकारी
कैराकल एक मध्यम आकार की जंगली बिल्ली है. लेकिन इसकी फुर्ती और शिकार करने की क्षमता इसे बेहद खास बनाती है. इसके कानों पर लंबे काले बाल इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं. और इसकी तेज रफ्तार इसे रेगिस्तान का एक घातक शिकारी बनाती है. यह इतनी ऊंची छलांग लगा सकता है कि हवा में उड़ते पक्षियों को भी पकड़ लेता है. इसी वजह से इसे ‘रेगिस्तान का छोटा चीता’ भी कहा जाता है. यह ज्यादातर रात में सक्रिय रहता है और झाड़ियों में छिपकर अपने शिकार का इंतजार करता है.

भारत में कैराकल की स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. एक समय यह देश के कई हिस्सों में पाया जाता था. लेकिन अब यह सिर्फ कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गया है.राजस्थान, खासकर जैसलमेर और बाड़मेर का थार क्षेत्र. इसके अस्तित्व की आखिरी उम्मीद बन चुका है.विशेषज्ञों के अनुसार, पूरे भारत में इनकी संख्या 50 से भी कम हो सकती है. जो इसे अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में रखता है.वन विभाग अब पूरे थार क्षेत्र में बड़े स्तर पर कैमरा ट्रैप लगाने की योजना बना रहा है. ताकि इस प्रजाति की वास्तविक संख्या और आवास का सटीक आकलन किया जा सके. इसके लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जा रही है. जिसे वर्तमान अध्ययन के पूरा होने के बाद लागू किया जाएगा. अगर यह योजना सफल होती है. तो न सिर्फ कैराकल बल्कि पूरे थार इकोसिस्टम के संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है.

“कैराकल – रेगिस्तान का रहस्यमयी शिकारी”
स्थानीय नाम: पड़ंग
वैज्ञानिक नाम: Caracal caracal
पहचान: कानों पर लंबे काले बाल  
स्पीड: 80 किमी/घंटा तक
जंप क्षमता:
एक बार में 3 से 4 मीटर ऊंची छलांग
हवा में उड़ते पक्षियों को पकड़ सकता है
खान-पान:
चिंकारा, खरगोश, छोटे स्तनधारी
जमीन पर रहने वाले पक्षी
रहने का तरीका:
सूखे रेगिस्तान और घासभूमि
 झाड़ियों में छिपकर शिकार

भारत में कहां पाया जाता है?”
राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर)
गुजरात के कुछ शुष्क क्षेत्र
मध्य भारत के सीमित इलाके
कुल अनुमानित संख्या: 50 से भी कम
“जैसलमेर में कहां दिखा?”
घोटारू (भारत-पाक बॉर्डर)
रामगढ़ – शाहगढ़ क्षेत्र
बाछिया क्षेत्र (घटना स्थल)
कैसे हो रही है ट्रैकिंग?”
मोशन सेंसर कैमरा ट्रैप
रेडियो कॉलर (GPS ट्रैकिंग)
24x7 मॉनिटरिंग
WII द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन 

थार के रेगिस्तान में ‘पड़ंग’ की ये वापसी एक उम्मीद है लेकिन यह उम्मीद बहुत नाजुक है.एक तरफ वैज्ञानिक और वन विभाग इसे बचाने में जुटे हैं. तो दूसरी तरफ मानव-वन्यजीव संघर्ष इसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है.सरहद पर जहां हमारे जवान देश की रक्षा कर रहे हैं. वहीं यह बेजुबान शिकारी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.कैमरा ट्रैप में कैद ये तस्वीरें सिर्फ एक खबर नहीं. बल्कि एक चेतावनी हैं—अगर अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां ‘पड़ंग’ को सिर्फ किताबों में ही देख पाएंगी.