VIDEO: 13 साल तक कोर्ट के आदेश की होती रही अनदेखी, जयपुर नगर निगम आयुक्त की कुर्सी को किया गया कुर्क, देखिए ये रिपोर्ट

जयपुर: जयपुर में प्रशासनिक लापरवाही और न्यायिक आदेशों की अनदेखी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने नगर निगम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. साल 1995 से जुड़े एक पुराने केस में 20 सितंबर 2013 को सुनाए गए हाईकोर्ट के फैसले की अवमानना के चलते आखिरकार अदालत को कड़ा कदम उठाना पड़ा. करीब 13 साल तक आदेश की पालना नहीं होने पर ACJM-1 कोर्ट ने नगर निगम आयुक्त की कुर्सी को कुर्क करने के आदेश दे दिए और आज यह कार्रवाई अमल में लाई गई. 

13 साल बाद भी आदेश की अनदेखी: 
-कोर्ट ने नगर निगम आयुक्त की कुर्सी की कुर्की कर बनाई मिसाल
-ACJM-1कोर्ट जज तापस सोनी ने दिए आदेश
-1995 से जुड़े एक पुराने केस में 20 सितंबर 2013 को दिए थे आदेश
-बनीपार्क स्ट्रीप लैंड आवंटन मामले दिया गया बड़ा आदेश
-चंद्रकांत नागर बनाम जेडीए एवं अन्य के मामले पर आदेश
-हाईकोर्ट के 2013 के आदेश की अवमानना पर सख्त कार्रवाई
-ACJM-1 कोर्ट के निर्देश पर निगम मुख्यालय में हुई कुर्की

दरअसल, यह मामला चंद्रकांत नागर बनाम जेडीए एवं अन्य से जुड़ा हुआ है. 26 सितंबर 2013 को हाईकोर्ट ने नगर निगम को स्पष्ट आदेश दिया था कि परिवादी को आवंटन पत्र जारी किया जाए. लेकिन हैरानी की बात यह है कि एक दशक से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद नगर निगम ने इस आदेश की पालना नहीं की. यह प्रशासनिक ढिलाई और आदेशों की अनदेखी का ऐसा उदाहरण बन गया, जिसने न्याय व्यवस्था की गरिमा को भी चुनौती दी. लंबे इंतजार और बार-बार प्रयासों के बाद भी जब परिवादी को न्याय नहीं मिला, तब मामला फिर अदालत पहुंचा और सख्त कार्रवाई की मांग की गई. 

अदालत ने इस मामले में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई। ACJM-1 कोर्ट के जज तापस सोनी ने 20 मई को आदेश जारी करते हुए नगर निगम आयुक्त की कुर्सी को कुर्क करने का निर्देश दिया. आज अदालत के आदेश के तहत सेल अमीन बाबूलाल शर्मा, डिक्रीदार रश्मिकांत नागर और उनके अधिवक्ता संजय शर्मा नगर निगम मुख्यालय पहुंचे. अधिकारियों की मौजूदगी में आयुक्त की कुर्सी को कुर्क करने की कार्रवाई की गई. इस दौरान निगम के अधिकारियों ने कोर्ट की टीम से बातचीत करते हुए 2-3 दिन का समय मांगा और आवंटन पत्र जारी करने का आश्वासन दिया, लेकिन कोर्ट से आई टीम ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया और कुर्की की प्रक्रिया पूरी की.

नगर निगम मुख्यालय में आयुक्त की कुर्सी की कुर्की की खबर पूरे दिन चर्चा का विषय बनी रही. यह दृश्य प्रशासनिक तंत्र के लिए बेहद असहज और शर्मनाक स्थिति का प्रतीक माना जा रहा है. कुर्सी केवल एक फर्नीचर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और अधिकार का प्रतीक होती है. उसकी कुर्की यह दर्शाती है कि जब जिम्मेदारी निभाने में चूक होती है, तो अधिकार भी छिन सकते हैं. कुर्सी कुर्क होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि नगर निगम आयुक्त अब किस प्रकार अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे. प्रशासनिक कार्यों की निरंतरता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन सकता है. यह घटना न केवल वर्तमान आयुक्त के लिए बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम के लिए एक चेतावनी है कि कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करना कितना महंगा पड़ सकता है.

यह मामला केवल एक व्यक्ति के आवंटन पत्र का नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है जहां आदेश आते हैं, लेकिन फाइलों में दबकर रह जाते हैं. 13 साल तक एक स्पष्ट आदेश को लागू न करना प्रशासनिक विफलता का बड़ा उदाहरण है. इस तरह की कार्रवाई बेहद दुर्लभ होती है और यह एक मजबूत संदेश देती है कि न्यायपालिका अपनी अवमानना को लेकर सख्त है. कुर्सी की कुर्की एक प्रतीकात्मक लेकिन प्रभावी कार्रवाई है, जो प्रशासन को चेतावनी देती है. न्याय की इस कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कानून की नजर में कोई बड़ा नहीं होता. अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या नगर निगम इस चेतावनी से सबक लेगा या फिर व्यवस्था यूं ही लापरवाही के बोझ तले दबती रहेगी.